माता वैष्णो देवी का इतिहास क्या है, क्यों आते है लोग अपनी मुराद लेकर, जानिए इनकी सच्ची कहानी

माता वैष्णो देवी मंदिर
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वैष्णो देवी मंदिर भारत के सबसे पुराने मंदिर में से एक है। इसका एक समृद्ध इतिहास है, जो लोगों को अभी तक नहीं पता। कुछ लोगों को अभी तक इस मंदिर के मान्यता के बारे में नहीं जानते है। इस आर्टिकल में वैष्णो देवी का इतिहास, क्यों दर्शन के लिए आते है लोग, क्यों माता ने भैरव से छुपकर तपस्या की थी इसके बारे में और भी जानकारी मिलेगी।

वैष्णो देवी का इतिहास

वैष्णो देवी मंदिर भारत में जम्मू और कश्मीर के क्षेत्र कटरा नगर के समीप पहाड़ियों में स्थित है। इन पहाड़ियों को त्रिकुटा पहाड़ी भी कहते है। उस गुफा में माता वैष्णो देवी की तीन मूर्तियां है। सरस्वती, लक्ष्मी और काली की हैं। 700 वर्ष पहले की बात है। कटरा के समीप स्थित हंसाली गांव श्रीधर शर्मा नामक एक ब्राह्मण रहता था, जो माँ का परम भक्त था। उसने एक बार नवरात्रियों में नौ कन्याओं को भोजन के लिए बुलाया और माता वैष्णो भी बल रूप रखकर उन कन्याओं के साथ शामिल हो गयी थी। भोजन करने के बाद सभी कन्याएं चली गई थी, लेकिन माता वैष्णो नहीं गई। वह वही बैठी रही। उन्होंने श्रीधर को एक भोज करने का आदेश दिया और आसपास के सभी गाँवो को भुलाने का आदेश दिया। जब भंडारा शुरू हुआ तो माता ने अपने चमत्कारी बर्तन से भोजन परोसना शुरू किया भोजन परोसते हुये माता जैसे ही गोरखनाथ के एक शिष्य भैरों नाथ के पास पहुंची तो वह मांस और शराब की मांग करने लगा। लेकिन माता वैष्णो देवी ने उनसे कहा कि उन्हें केवल शाकाहारी भोजन मिलेगा, क्योंकि यह एक ब्राह्मण की दावत है।

भैरव नाथ और माता वैष्णो का युद्ध

जब भैरव ने माता को पकड़ने की कोशिश की, तो माता त्रिकुटा पर्वत की ओर भाग गयी। भैरव भी माता का पीछा करने लगे। उससे बचने के लिए माता एक गुफा में चली गई और नौ महीने तक गुफा में तपस्या की। भैरो भी माता का पीछा करते एक गुफा में पहुंच गया। वहां एक साधु ने भैरव नाथ से कहा कि जिसे तू कन्या समझ रहा है। वह आदिशक्ति जगदंबा है तू उसका पीछा करना छोड़ दे। भैरव नाथ ने साधु की एक बात नहीं मानी और गुफा में जाने की कोशिश की। माता गुफा के दूसरी और से रास्ता बनाकर बाहर निकल गई। जब माता बाहर निकली तो उन्होने देवी का रूप धारण किया था। उन्होंने भैरव नाथ से यहाँ से वापस जाने को कहा, लेकिन भैरव नाथ एक नहीं माना, तो माता ने महाकाली का रूप धारण करके अपने चक्र से भैरो नाथ का सिर धड़ से अलग कर दिया था। भैरो नाथ का सिर कट कर उस स्थान से 8 किलोमीटर दूर त्रिकुट पर्वत की घाटी में जा गिरा। जिसके बाद भैरो घाटी के नाम से जाने लगा। जिस स्थान पर माता ने भैरो नाथ का वध किया उस स्थान पर माता के पवित्र मंदिर स्थापित हुआ।

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माता वैष्णो देवी के आरती का समय

माता वैष्णो देवी मंदिर में पुरे साल तीर्थ यात्रा के लिए भक्त का स्वागत होता है। हर लाखों भक्त स्थान पर आते है। खासकर त्योहारों या किसी विशेष दिन के समय जब तीर्थयात्रा का मौसम बढ़ जाता है। भक्त किसी भी सप्ताह के दिन आशीर्वाद ले सकते हैं, क्योंकि मंदिर सुबह से 5 बजे से दोपहर तक बंद रहता है। क्योंकि यह देवी के आराम करने का समय होता है।

  • सुबह की आरती के लिए द्वार जल्दी खुल जाते है, ताकि भक्तगण सुबह की आरती देख सकें। आम तौर पर सुबह की आरती का समय लगभग होता है। 6:00 am to 8:00 am देवी मां के सामने आरती की लपटें जलती हैं।
  • दिन की आरती का समय 1 बजे से 2 बजे तक आरती की जाती है। जिसे भोग आरती कहा जाता है। इस आरती के दौरान देवी की मूर्ति के सामने भोग लगाया जाता है और उसके बाद भक्तों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
  • जैसे-जैसे दिन ढलने के करीब आता है। श्याम की आरती माता वैष्णो देवी को दी जाने वाली आखिरी आरती होती है। शाम की आरती का समय सुबह 11 से 12 बजे तक है। 7 से 8 बजे तक मंदिर दीपक और दीयों की रोशनी में चमक उठता है।
  • मंदिर कुछ दिनों के लिए रात्रि दर्शन के लिए भी खुला रहता है, ताकि भक्तगण एक अनोखा और जादुई अनुभव प्राप्त कर सकें। रात में मंदिर में जाना एक अलग ही अनुभव होता है। पहाड़ अंधेरे में ढके होते हैं, जिसके बीच से दिव्य मंदिर चमकदार रोशनी के साथ झांकता है।
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माता वैष्णो देवी के अंदर की पूजा-रस्मे

आतम पूजा

माता की आरती करने से पहले आतम पूजा नामक एक अनुष्ठान होता है, जिसमें वैष्णो देवी को दूध, जल, चीनी, दही और शहद से स्नान कराया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान पुजारी श्लोक और मंत्रों का जाप करते हैं, जब देवी को साड़ी, चोला, चुन्नी और आभूषण पहनाए जाते हैं। इसके बाद, दिव्य देवी के माथे पर तिलक लगाया जाता है और पुजारी इस प्रक्रिया के बाद पूजा करते हैं।

आरती

वैष्णो देवी के मंदिर में सबसे महत्वपूर्ण समारोह है। वैष्णो देवी की पूजा दिन में दो बार या तीन बार की जाती है। सुबह की आरती को मंगल आरती के नाम से जाना जाता है और शाम को की जाने वाली आरती को ‘संध्या आरती’ के रूप में जाना जाता है। मूर्ति के सामने आरती करने के दीया या ज्योति जलाई जाती है। वैष्णो देवी की आरती दो स्थान पर की जाती है, पहला देवी माँ के सामने और दूसरा पवित्र गुफा के बाहर। भक्त दिव्य देवी से आशीर्वाद लेने के लिए मंदिर के सामने इकट्ठा होते हैं।

प्रसाद चढ़ाना

हिन्दू धर्म में प्रसाद चढ़ाना एक अपना धर्म है। विभन्न अनुष्ठानों और आरती के बाद, माता को विभिन्न प्रकार के  खाद्य पदार्थ जैसे फल और मिठाई चढ़ाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि देवी-देवता प्रसाद ग्रहण करते है और फिर वापस कर देते है। बाद में पुजारी देवी के आशीर्वाद के रूप में भक्तों को प्रसाद प्रदान करते हैं।

चरण पादुका दर्शन

माता वैष्णो देवी के मंदिर में एक और अनुष्ठान किया जाता है, चरण पादुका दर्शन। यह माता वैष्णो देवी के पदचिहन है, जो मुख्य रूप से मंदिर से 1.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह सफ़ेद मंदिर और चरण पादुका रखे गए थे। लेकिन ऐसा नहीं है। यह वह स्थान है, जहां वैष्णो देवी यह देखने के लिए रुकी थीं कि क्या भैरों नाथ अभी भी उनका पीछा कर रहे हैं।

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वह उसे देखने के लिए चट्टान पर खड़ी हो गई। तब चट्टान पर उनके पैरों के निशान बन गए। कई भक्त तो इस मंदिर के दर्शन करने और देवी के पैर के निशान के प्रति आभार प्रकट करने आते हैं।

हवन

हवन या यज्ञ एक अग्नि अनुष्ठान है, जो माता वैष्णो देवी के मंदिर में हर रोज किया जाता है। मंदिर के पुजारी मंत्रोच्चार करते हुए अग्नि में घी, जड़ी-बूटियाँ और पवित्र वस्तुएँ अर्पित करके हवन करते हैं। हवन करने से ऐसी ऊर्जा पैदा होती है, जो न केवल शुद्ध करती है बल्कि आसपास के वातावरण में शांति और सद्भाव भी लाती है।

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माता वैष्णो देवी मंदिर कैसे पहुंचे

माता वैष्णो देवी मंदिर जाने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि वहाँ कैसे पहुँचा जाए। मंदिर तक पहुँचना अब उतना मुश्किल नहीं है जितना पहले हुआ करता था क्योंकि आज परिवहन के कई साधन उपलब्ध हैं।

एयर द्वारा जाना

कटरा से सबसे नजदीक हवाई अड्डा जम्मू हवाई अड्डा है। जिसे सतवारी हवाई अड्डा कहा जाता है। यह कटरा से लगभग 50 किमी दूर स्थित है। भारत के अन्य शहरों से यहाँ की उड़ान अच्छी तरह से जुडी हुई है। जम्मू हवाई अड्डे पर पहुँचने के बाद भक्त हवाई अड्डे से कटरा के लिए टैक्सी ले सकते हैं। जम्मू से कटरा तक लोगों के लिए हेलीकॉप्टर सेवाएं भी उपलब्ध हैं। तीर्थयात्री कटरा से सांझीछत तक हेलीकॉप्टर से जा सकते हैं, जो वैष्णो देवी मंदिर से लगभग 2.5 किलोमीटर दूर स्थित है। कोई भी व्यक्ति ऑनलाइन प्लेटफॉर्म श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड से हेलीकॉप्टर सेवाओं को आसानी से बुक कर सकता है।

ट्रेन से जाना

कटरा जाने के लिए ट्रेन भी सुविधजनक तरीकों में से एक माना जाता है। कटरा का सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन श्री माता वैष्णो देवी कटरा रेलवे स्टेशन है। यह रेलवे स्टेशन माता वैष्णो देवी के मंदिर की यात्रा के शुरुआती बिंदु से सिर्फ़ तीन किलोमीटर दूर है। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों से कई सीधी ट्रेनें उपलब्ध हैं जो भक्तों के लिए मार्ग आसान बनाती हैं।

बसों से जाना

माता वैष्णो देवी मंदिर कई राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों के माध्यम से प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। सरकार द्वारा संचालित बसें जो आसपास के राज्यों के लोगों के लिए नियमित रूप से विभिन्न बस सेवाएं प्रदान करती हैं। कई शहरों से कटरा तक कई निजी वातानुकूलित डीलक्स बसें हैं और टैक्स भी उपलब्ध हैं। कटरा से पवित्र भवन तक पहुँचने के लिए लगभग तेरह किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। कटरा से पवित्र भवन तक पहुँचने के दो रास्ते हैं, एक मुख्य या सीधा रास्ता और दूसरा वैकल्पिक रास्ता। पुराने मार्ग पर रेन शेल्टर हैं और मार्ग के किनारे पानी के बिंदु मौजूद हैं। इस मार्ग पर उचित प्रकाश व्यवस्था स्थापित की गई है। जिससे लोगों को आसानी से ट्रेकिंग करने में आसानी हो। दूसरी ओर, वैकल्पिक ट्रेक तारकोट मार्ग से शुरू होने वाला सबसे नया ट्रैक है। यह ट्रैक पुराने ट्रैक से जुड़ा हुआ है, लेकिन इसमें पालकी और टट्टू की अनुमति नहीं है।

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